धर्म और अधर्म

किसी भी




प्राणी को हम मन वचन और कर्म से मानसिक तनाव से मुक्त कर कुछ क्षण की खुशी देते हैं यही धर्म है यहीं पुण्य है यहीं न्याय है औऱ जब हम किसी प्राणी को मन वचन या कर्म से दुखी करते हैं या उसकी भावनाओं को आहत करते हैं तो बही पाप अधर्म और अन्याय होता है यही ज्ञान है और इश्वर के प्रति अपनी आस्था का केन्द्र भी यही से उत्पन्न होता है।

इश्वर ने सभी योनियों में सर्वश्रेषठ मानव योनि को वनाया है और मानव को ही ज्ञान से भरपूर शिक्षा दी है तब भी मानव अगर धर्म और अधर्म का विशलेषण नहीं कर सका तो हमारा जीवन असफल रह जाएगा।मनुष्य को कोई अधिकार नहीं है कि वह दूसरे प्राणी यानि पशु पक्षी या किसी जानवर की हत्या करे । मनुष्य को दूसरे प्राणी का मांस खाने का भी कोई अधिकार नहीं है।

पं पुरूषोत्तम शर्मा